शिकायत
चली गयी उम्र, पढ़ाई-लिखाई-कमाने में , मै चलता ही रहा।
दौड़ा किया बैल की तरह, गधे सा मेहनत करता ही रहा।
बचाता भी रहा कुछ सिक्के एक उम्मीद में।
जब चैन मिलेगा इसीसे आराम से जी लूंगा।
ऐसे जीऊंगा जैसे देखा था मैंने इसे ख्वाबो में।
सजाकर रखा था जिसे मैंने ख़यालो में।
कभी खयाल ही नहीं आया की वक़्त भी बेईमान होगा।
और बिना कहे एक दिन तू बुलावे की चिट्ठी भेज देगा।
अगर करना ही था तुझे ऐसा खिलवाड़ तो क्यों भेजा था मुझे इंसानो में ?
जब लेही जाना था अधसजासा, तो भेजही देता कीड़े मकोड़ो की दुनियाँ में।
क्यों भगाया मुझे इतना? क्यों सताया मुझे इतना?
क्यों बसाये आँखों में सपने? क्यों रुलाया मुझे इतना?
अगर बुलाना ही था दूर अपनो से, तो मुझे दिलाया ही क्यों इतना?
बहुतसी शिकायते है तेरी, अब पूछूंगा भी तुज़से कैसे?
बहोत ही सवाल खड़े किये थे तूने जिंदगी में,
काश कुछ जवाब ही दे देता, थोडासा चैन से लेके जाता।
सोच रहा हु क्या मुँह लेके आऊंगा मै तेरे पास ?
बहोत सारे सपने थे , पर कर पाया कुछ खास,
जो कुछ कमाया था सब छोड़ना पड़ा यही आज।
कुछ तो ख्वाब पुरे करने देता,
गलतियां कहाँ पे हुयी? थोड़ा समझने देता,
क्या गलतिया थी मेरी? अब तो मै सोच भी नहीं सकता।
शायद तुझे कोसना मेरी मूर्खता होगी।
जब बढ़ी थी सैलाब की रात, होश में आजाना चाहिए था मुझे।
तूने दि तक़दीर पे, हाथ ऊपर करके यूँ खड़ा नहीं रहना चाहिए था मुझे।
जो ऐसे तूफान में खुदको घिरने दिया, ये मेरी ही गलती होगी।
अनगिनत सवालो पे अनकहे से जवाब मिले, कुछ तो गलतिया तेरी भी होगी।
१९ अप्रैल २०२१
डॉ प्रविण करंदीकर।