Thursday, 29 October 2020

              मुठी आवळून खेळत बसतो मी
                         जानेवारी, फेब्रुवारी, मार्च, एप्रिल, मे, जून, जुलै
                                                                                 मग पावसाळi,
           गेल्या पावसाल्यात मी मुठी वाळल्या नव्हत्या,
                         बोट मोकळी होती,
                                         दिवस मोजन्यासाठी,
          सोमवार, मंगळवार, बुधवार, गुरूवार, शुक्रवार, शनिवार मग रविवार.
                        मग सुट्टी.
                                       भरपूर वेळ.
         आज तुला भेटता येइल.
                     पण तुझ्या बापाच्या डोक्यात पिकनिक स्पाट,
                                    मग मी spot मोजत बसायचो.
          लोनावला, खंडाला, एकवीरा, लोह्गड़, कशिद बिच etc etc,
                     मग काहीच नाही.
                                    मग  पावसाळi संपायचा,
          मग परत,
                    मी मुठी आवळून खेळत बसायचो ,  ................................


डॉ. प्रविण करंदीकर, गणपुरकर. 

Saturday, 21 March 2020


महामारी

आज कल बहोत बीमार बीमार सा लगने लगा है |
कल था उछलता हुआ शहेर मेरा,
आज खामोश सा लगाने लगा है ||
किस महामारी ने बदली है यहाँ की करवटे |
हर राह चलता मुसाफिर दुश्मन सा लगाने लगा है ||
तभी तो कहिओ पे लगने लगा है आरोप बीमारी का |
और एक हसता हुआ राहगीर अस्पताल जाने लगा है ||
क्या करे ? मार डाले सभी मरीजों को ?
या ढूंढ लाये दारु जो बीमारी पे काबू पाएं !
क्यों हर एक शक्स,
एक दूसरे पे शक करने लगा है ???

डॉ. प्रविण करंदीकर 

Monday, 24 February 2020



वचनांची बरसात पावसात बरसली,
चुम्बनोल्या ओठानकडन ओठानवर  पसरली,
बिलगली, मुरवली, देहभान हरवली,
शरीरभर पसरताना, क्षण क्षण हरपली,
प्रेम बीम सूखे मोती, कागदांवर लिहिली नाती,
कुजलेल्या इतिहासात, भुगोलाची वेगळी महती,
दिले घेतले शब्द होते, देहावरचे गंध होते,
चटावलेली साथ होती, ऊगा ऊगा बंध होते,

डॉ . प्रविण करंदीकर . 
मारून मारून उड्या मारशील किती ?
घरभर काळा उडीद पेरशील किती ?
फुकटचा चहा अजूनही हक्काचा बाकी आहे,
लिहून ठेव, ह्या महिन्यात खुप तंगी आहे,
(नंगिला म्हणे पैसे आहेत????)
……………
…….
दरबार भरला की हजर होतात सगळे मुडदे ,
अन बिन पैशाची लावतात बोली,
(किती वर? किती खाली? माहितच नसत काही )
…….
मग हजर होतो एक बहिरा ससाना,
आणि दरकदार ठोकतो आरोळी>>>>
>>>बामुलायाजा बाअदब ……….
……. होशियार … (पण त्यालाच नसत माहित "नक्की कोण?)
……….
मग सुरु होतो खेळ, रंडी बाजार भरावा, तसे सगळे ओरडत असतात,
फेका-फेकी (फका-फ़की) करुण, आपली वोटबँक वळवत असतात ….
मग उरलेलच नसत काही ???
…. परवाच ऐकल "म्हणे सगळ्याच घोटाळ्याच्या घोटाळा झाला,
शरदाच्या चांदण्यातला बैल बाईनी पळवला"… वेडे  लोक म्हणतात
"तर म्हणे कशाला??"
(वेडेच आहेत, कामाची वस्तु ती, लागणार असेलना बाईना???)   


डॉ . प्रविण करंदीकर .