महामारी
आज कल बहोत बीमार बीमार सा लगने लगा है |
कल था उछलता हुआ शहेर मेरा,
आज खामोश सा लगाने लगा है ||
किस महामारी ने बदली है यहाँ की करवटे |
हर राह चलता मुसाफिर दुश्मन सा लगाने लगा है ||
तभी तो कहिओ पे लगने लगा है आरोप बीमारी का |
और एक हसता हुआ राहगीर अस्पताल जाने लगा है ||
क्या करे ? मार डाले सभी मरीजों को ?
या ढूंढ लाये दारु जो बीमारी पे काबू पाएं !
क्यों हर एक शक्स,
एक दूसरे पे शक करने लगा है ???
डॉ. प्रविण करंदीकर
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