johanti^s blog
Friday, 8 May 2015
सोया सोया सा लग रहा हैं यह शहर,
फिर भी अंधेरेमे लोग ज़ाग रहें हैं,
पता नहीं किस
शहर
की हवा यहाँ चल रही हैं?
कल देखा था इसे मैंने मेरी बाहों में सहमाये हुए,
सिंसकिया ले रहा था वह,
न जाने किस घबराहट से
लिपट गया था मेरे सिने से,
मुझे उस वक्त अंदाज़ा न हुआ,
"किस तूफान की यहाँ बारिश होने वाली हैं?"
और खामोश सा यह
शहर
,
आज क्यों मेरी तलाश मैं हैं?
सुना हैं। .... बहोतही बेहेस हुई थी यहाँ,
मेरे जाने के बाद.
पता नहीं कीस तकलिफसे गुजरा होगा वों, और.……
…. ना मिलने से मेरे "क्या जिंदा रहा होगा वों ?"
क्या बहस चल रही थी ???
तेरी-मेरी और क्या क्या??
क्यों इसी खामोशसी
कोलाहल में हमें सिमट जाना हैं?
क्यों मुहं पे पानी फेर के छिपा रहां हैं इन आंसुओंको?
जा, तेरी तलाश का
शहर
आज भी तेरी राह देख रहा है।
"इन आंसुओंमें तो बारीशतो नहीं भरी हुईं है।"
क्या इसी खामोशसि कोलाहल में हमें सिमट जाना हैं?
प्रविण करंदीकर।
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